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मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Mon Dec 19, 2011 5:39 pm
by csahab
मुझे याद नहीं मैंने फ़िल्में देखना कब शुरू किया, हाँ इतना जरुर याद है की देखी बहुत सी फ़िल्में हैं. पहले आज की तरह 24 घंटे का चैनल नहीं हुआ करते थे.एक मात्र देखने का जरिया दूरदर्शन हुआ करता था. जोकि हफ्ते में 2 बार फिल्मे देता था शनिवार और रविवार. पर हम लोगों के पास एक और भी जरिया था वो था वीडियो. जो अकसर हम किराये पर लाते थे. जिस समय किराये पर वीडियो लाने का चलन था उस समय वीडियो वाले की बड़ी चाँदी हुआ करती थी. वीडियो देने से पहले वो 4-5 हितायतें देता साथ ही वीडियो कैसट ना छूने की सलाह देता. हम सब कुछ हाँ में कहते और ले कर चले आते.

उस समय 3-4 स्टार अपने टॉप पर थे. मिथुन, गोविंदा, अमिताभ और जितेंदर उनमे से कुछ नाम है. हम पूरी रात के लिए विडियो किराये पर लेते थे. वैसे मेरा मोहल्ला था तो बहुत बड़ा पर हमारी बोलचाल कम से थी, और उतना ही कम आने-जाना व्यव्हार. सिर्फ कुछ ही परिवार थे जिनके घर आना जाना होता था. तो जब घर में वीडियो लाया जाता तो उनको बुला लिया जाता और घर में एक छोटी-मोटी पार्टी का माहौल होता. चूँकि हम छोटे थे तो बड़ा मजा आता की घर पर खूब सारे लोग है. उपर से पढ़ने का कोई इरादा नहीं तो खुशी से खुशी दुगनी हो जाती थी. इन सब के बीच जो सबसे बड़ी समस्या होती कि कौन-कौन सी फिल्मे आनी है. उस समय जो चल रही होती वो तो आती ही, फिर होती दूसरी और तीसरी फिल्म कौन सी होगी. यह समस्या उस रात से 2-3 दिन पहले तक होती. अच्छा हम लोग हल्ला भी ज्यादा नहीं कर सकते थे क्योंकि डर भी लगता कहीं घरवाले भी ना डांटे और वीडियो लाने का प्रोग्राम ही रद्द ना कर दें. तो सारा काम बड़े ही चतुराई से करना होता था. आखिर में सब मिला जुला कर 2 नई फिल्मे और एक थोड़ी पुरानी फिल्म लाने का फैसला होता. बड़ों का भी ख्याल रखना पड़ता था.

फ़िल्में खाने-पीने के बाद लगभग 9 बजे शुरू होती. उस दिन खाना भी फिल्म के चक्कर में जल्दी हो जाता. हम सभी को खाने पीने में मन नहीं लगता क्योंकि अंदर से खुशी तो फ़िल्में देखने की होती और खाना पेट में जाता ही नहीं. घरवाले जैसे-तैसे करके खाना खिलवाते और फिर टीवी के आगे मंडली जम जाती. वीडियो वाला भी रात में हम ही लोगों के साथ टीवी देखता क्योंकि उसे लगता की कहीं कोई गडबड हो गयी तो क्या होगा. इसलिए वो अपने एक जूनियर को भेजता. ना जाने कितनी तार लगाने के बाद तो VCR चलता. उसके तार लगाने के साथ ही हम सब कैसट चेक करते-करते वीडियो वाले की तरफ देखते कहीं वो देख तो नहीं रहा.
फिर वीडियो शुरू हो जाता. मुझे याद है हर वीडियो चलने के पहले एक अजीब से धुंधली लाइन आती. कुछ दिनों बाद हमे भी पता चल चलने लगा कि वीडियो अच्छा है या बुरा. मेरा मतलब प्रिंट से था, और हम पहले से बोलने लगते “भईया ये कैसट खराब है बदल कर लाओ”. जब भी ऐसा होता तो वीडियो वाला पता नहीं VCR के किस-किस हिस्से में फूँक मरता और वीडियो सही चलने लगता. हमें वो वीडियो वाला उस दिन बड़ा चमत्कारी लगता और सोचते की बड़े होकर में भी वीडियो वाला ही बनूँगा. पर अगले ही पल ये सारे विचार रद्द कर के फिल्म देखने में लग जाता. मुझे फिल्मों में हीरो के साथ-साथ विलेन भी बड़े अच्छे लगते. खैर पहले जब छोटा था तो सब बराबर ही लगते पर जैसे-जैसे बड़ा हुआ तो लगता की विलेन अगर विलेन नहीं होता तो किसी हीरो से कम नहीं होता. क्योंकि हर परेशानी हीरो को ही होती है खलनायक मजे करता है. सुर, सुरा और हीरोईन से कहीं से भी कम न दिखने वाली वैम्प जो उसके साथ रहती. इतना ही नहीं वो लड़की(वैम्प) उसके लिए किसी स्तर तक जाने को तैयार रहती. वहीँ हीरो को पता नहीं क्या क्या करना पड़ता था. गाना गाने से लेकर, नौकरी करना, धक्के खाना, उसके पापा से शादी की बात करना इत्यादि. मैं कभी कभी सोचता की यार हीरो से अच्छा तो विलेन ही होता है. उसे सब कुछ पहले से मिला होता है. और वो हीरो से ज्यादा पॉवरफुल होता है. मुझे भारतीय फिल्म इतिहास के विलेन में कुछ बहुत ही खास और अच्छे लगते हैं/थे. एक तो सदाबहार अमरीशपुरी, फिर उनके छोटे भाई मदनपुरी. मुझे मदनपुरी की बन्दूक पकड़ने की अदा बड़ी अच्छी लगती थी. साथ एक और थे जो बन्दूक बड़ी अदा से पकड़ते थे वो थे K.N Singh. मुझे याद है संजय दत्त की एक फिल्म थी सड़क. जिसे में 1 हफ्ते में कोई 10 बार देखी होगी कारण सिर्फ सदाशिव अमरापुरकर थे. क्या एक्टिंग करी थी उन्होंने उस फिल्म में. मुझे आज भी विलेन हीरो से अच्छे हो लगते है. पुराने फिल्मों में एक बड़ी अजीब आवाज़ आती जब हीरो और विलेन के बीच लड़ाई होती वो होती थी मुंह से निकलने वाली आवाज़ ढिशुम-ढिशुम. ये बात मुझे मेरे पिता जी ने बताई क्योंकि मुझे लगता था की यह आवाज़ सच में निकलती है जब किसी दो लोगों के बीच हाथापाई होती है तो. आज उन आवाज़ हो किसी फिल्मों में सुनता हूँ तो हँसी सिर्फ चेहरे पर नहीं दिल में भी होती है.

कुछ ऐसा ही मंजर मुझे मेट्रो में देखने को मिला. मैं अपनी सीट पर बैठा किताब पढ़ रहा था तभी मुझसे अगले गेट के पास से 2 लोगों के झगडे की आवाज़ आयी. दोनों सीट को लेकर झगडा कर रहे थे. हुआ ये था की एक जबान बैठे थे और एक जनाब खड़े थे. जो जनाब खड़े थे उनको बार–बार पैर लग रहा था. कैसे ये नहीं पता. बस उसी बात पर झगडा हो रहा था. तभी इन दोनों के बीच एक जनाब बीच-बचाव करने के लिए कूद पड़े. जो जनाब खड़े थे अब वो बैठे वाले को छोड़ कर बीच-बचाव करने वाले पर ही उल्टा सवार हो गए. दोनों की बातों में जमीन असमान का अंतर था क्योंकि जो खड़ा हुआ आदमी था वो ऑक्सफोर्ड का पढ़ा हुआ लगता था और दूसरा हरियाणा के एक सरकारी स्कूल वाला. कुछ देर तक वैसे ही बकझक होती रही. और अचानक सन्नाटा छा गया. ये तूफ़ान के पहले की ख़ामोशी थी. फिर अचानक इस सन्नाटे को चीरते हुए एक आवाज़ आयी. ढिशुम-ढिशुम. हर कोई उधर ही देखने में लग गया. हरयाणवी ने अपना जलवा दिखा दिया और ऑक्सफोर्ड वाले को मेट्रो में तारे दिखा दिए. मुझे भी ऐसी उम्मीद नहीं थी. पर ऐसा हो गया. उसके अगले स्टेशन पर ऑक्सफोर्ड और हरियाणा वाले मेट्रो के नीचे थे.

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Thu Dec 22, 2011 2:20 pm
by Ek Kanya
csahab... how do you write so well... :)

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Thu Dec 22, 2011 2:33 pm
by csahab
Dont know Ek kanya

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Thu Dec 22, 2011 5:31 pm
by amey katkar
ur articles keeps us engaged in it while reading...good post cSahab...!!!

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Thu Dec 22, 2011 5:52 pm
by csahab
Thanks amey

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Thu Dec 22, 2011 8:20 pm
by amey katkar
will love to see some more articless Csahab...!!!

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Fri Dec 23, 2011 10:58 am
by csahab
Thanks amey

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Sun Dec 25, 2011 11:18 pm
by MissMallu
the nostalgia of those Video nights... sigh...

Oxford and Hariyana wale :)
nice... I like this one.

In our world, personal space is constantly being invaded. I think thats what leads to this frustrated repressed anger.

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Fri Mar 09, 2012 10:09 pm
by shrutigoyal
Worth reading.. very impressive :) ...

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Fri Mar 09, 2012 10:59 pm
by csahab
Thanks shruti

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Fri May 25, 2012 10:59 pm
by Priyanka
I loved he way you aptly descrived the oxford and metro wallah. Its such a subtle and correct way of describing the two different socio economic groups in our society. Well observed too.

Kya aapne un dodo ko phir dekha?

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Sat May 26, 2012 11:52 am
by csahab
Ji ab tak to dikhayi nahi diye hain..jab bhi bhi dikhayi denge to apko bata dunga

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Sun May 27, 2012 12:00 am
by Saumya
Kya aap unhe khojte hain?

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Sun May 27, 2012 12:00 am
by Saumya
Kya aap unhe khojte hain?

Re: मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम

Posted: Sun May 27, 2012 6:47 pm
by csahab
khojta to nahi par kabhi kabhi kuch chehre apko yaad ho jate hain kyonki aap unhe roz dekhte hain.