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बरसात कि वो रात...

Posted: Tue Aug 23, 2011 6:22 pm
by csahab
11अगस्त की बात है शाम के करीब 7 बजे होंगे. बादलों ने आज महीनो से सूखी धरती को सराबोर करने की ठान रखी थी. पानी इतनी तेज बरस रहा था, मानो आज ही सारा पानी गिर जायेगा. बूंदों की आवाज़ और सड़क पर पानी का बहाव दोनों ही अच्छे लग रहे थे. मेरा भी ऑफिस खत्म हो चुका था. घर जाने का इंतज़ार था, पर अब बारिश रुके तो चला जाए. पर पता नहीं क्यों, मेरा बारिश से एक अजीब सा रिश्ता है, उसकी पहली बूंद के साथ ही मेरे दिल में एक अजीब हलचल होने लगती है. और मेरा मन भीगने के लिए व्याकुल हो जाता है. मुझे याद है जब में छोटा था तो आप सभी की तरह कागज की कश्ती पानी में चलाता और उससे तेज मैं खुद भागता था. मेरे घर में एक बड़ा सा आँगन होता था जिसमे बारिश का पानी, टीन की चादरों से होता हुआ मेरे आँगन में आता था. कभी कही इतना पानी होता की आँगन में घुटनों से थोड़ा कम हो जाता था और मैं उसमे बड़ी मस्ती से खेला करता था. घंटों भीगता, पानी से खेलता और सब कुछ भूल जाता.

उम्र के साथ बहुत कुछ बदला पर बारिश में भीगना नहीं बदला. मैंने भी आज पानी में भीगने का मन बना लिया. वैसे भी दिल्ली में ऐसे मौके चूकने नहीं चहिये, बस फिर क्या था मैंने अपने ऑफिस के मित्र को जोर दिया और हम दोनों निकल पड़े बरसते पानी में भीगने के लिए. हमारे ऑफिस के आस-पास ऑटो और रिक्शे का आभाव है. हमें अक्सर मुख्य मार्ग तक पैदल ही जाना होता है जो करीब 300मीटर दूर है. मैं और मेरा मित्र, इस तेज बारिश में, सड़क पर तेज़ी से आती हुई लहरों को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे. वो मुझसे थोड़ा तेज चल रहा था तब मैंने उसे एक ज्ञान दिया कि विदेश के एक वैज्ञानिक ने रिसर्च किया और निष्कर्ष ये निकला कि चाहे आप भागे या आराम से चले दोनों ही परिस्थितियों आप एक समान ही गीले होंगे. पहले तो उसमे हैरानी जताई पर बाद में मान गया और मेरी तरह आराम से चलने लगा.

पर वो मेरी तरह गीले होने के पक्ष में नहीं था तो उसने जल्दी से एक ऑटो को आवाज़ दी और मुझे ले कर बैठ गया. मेरे सारे सपने जैसे पानी के साथ धुल गए. अब मैं क्या करता? मेरा और उसका रोज का साथ था, छोड़ कर जा भी नहीं सकता था. मैं भी मन मार कर बैठ गया. ऑटो वाले ने भी अचरज से देखा और अपनी गाड़ी कि रफ़्तार बढ़ा दी. अब तो सिर्फ छत पर पानी कि बूंदों के साथ सड़क पर गाड़ियों के चलने कि आवाज़ आ रही थी.

मेरे मित्र का स्टेशन पहले आता है, पर बात करते-करते समय कैसे कट जाता है पाता ही नहीं चलता. और मेट्रो एक एसी वाला पिंजरा है जिसमे आपको मजा तो आता है पर आप ज्यादा देर रहना पसंद नहीं करते. और मेरा तो वैसे भी आज मेट्रो से जाने का मन बिलकुल नहीं था. मैंने मेट्रो से उतर कर बस से जाने का फैसला किया. और राजीव चौक पर मेट्रो छोड़ दी. और बस से घर जाने के लिए निकल पड़ा. मुझे बस भी जल्दी मिल गयी और सीट भी. सड़क पर बरसात के कारण भीड़ ज्यादा थी.

पानी अपने पूरे जोर पर था. पानी कि बूंदों बस के शीशे से टकरा कर एक नई धुन बना रही थी. तभी मेरी नज़र पानी गिरते शीशे के पार गयी. एक लड़की बस के इंतज़ार में स्टॉप पर खड़ी थी. वो स्टैंड कोई बड़ा नहीं था. छत भी टपक रही थी. पानी कि बूंदे जैसे उस पर जानबूझ कर ज्यादा ही गिर रही थी. तेज हवा उसके दुप्पटे के साथ कुछ ज्यादा खेल रही थी बार-बार समुंद्र कि लहरों के तरह दुप्पटे को जोर से हिला रही थी. और वो उनसे बचने के लिए बार-बार उनको संभाल रही थी. पर उसके दूसरे हाथ में शायद कुछ था जो उसे उसका दुप्पटा नहीं संभलने दे रहा था. कभी वो पानी से बचने के लिए दुप्पटा के सर को ढकती और कभी हवा से गीला दुप्पटा उसके चेहरे पर आ जाता. जिस तरह ओस से गुलाब की पंखुरियों पर पानी की बूंदें जमा हो जाती है वैसे ही पानी की फुहारों से उसके गालों पर छोटी छोटी बूंदें थी जो हर बार दुप्पटे से साफ़ हो जाती और दुबारा आ जाती थी. उसका चेहरा बिलकुल बच्चों कि तरह था, बड़ी बड़ी ऑंखें, बिलकुल सलीके से सिला गया सूट. रंग मुझे याद नहीं पर उसमे वो बड़ी हसीन लग रही थी. ट्रैफिक भी स्लो था. मेरी और उसकी नज़र नहीं मिली. मैं भी शीशे पर बारिश से बनी ओस को रह-रह कर हटा कर उसे देखता कि उसे बस मिली या नहीं. सच पूछिए तो बस को कम उसे ज्यादा देख रह था. उसे कोई बस नहीं मिल रही थी और वो बरसात में ना चाहते हुए भीग रही थी. और मेरी बस धीरे-धीरे चल रही थी और मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था.

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Wed Aug 24, 2011 1:13 pm
by samrohi
Nice expressions! I share a somewhat same feeling with the rains!

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Thu Aug 25, 2011 4:53 pm
by Ek Kanya
I love the feeling of the drops of water collecting around the eye lashes :)

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Thu Aug 25, 2011 4:58 pm
by csahab
कन्या
इतनी पास से देखा होता तो उसका नाम भी लिखा होता ...कसम से.

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Mon Aug 29, 2011 9:55 am
by Saumya
we all love getting wet in the rain. I love thge smell of the earth after the first rains! :)

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Mon Aug 29, 2011 10:37 am
by csahab
yes me too. सौंधी सौंधी महक

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Mon Aug 29, 2011 10:41 am
by Hasmukh
saundhi saundhi mahak? I never knew thats what it was called...

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Mon Aug 29, 2011 10:48 am
by csahab
use saundhi mehak hi bolte hain.

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Sun Sep 04, 2011 6:03 pm
by Saumya
wow! now I know. but really, delhi is amazing n the rains...

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Tue Sep 06, 2011 11:49 am
by samrohi
its raining cats and dogs these days...

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Fri Sep 09, 2011 10:05 am
by Paromita
you write so beautifully, csahab! thats so beautiful and to know these kinds of thoughts and to be able to write them.. :)

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Fri Sep 09, 2011 2:10 pm
by csahab
Thanks

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Sun Sep 11, 2011 11:31 am
by Shahrukh Khan
very good writing, bro. very good...

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Mon Sep 12, 2011 10:36 am
by csahab
Thanks khan

Re: बरसात कि वो रात...

Posted: Tue Sep 13, 2011 1:19 am
by encyclomedia
beautiful...