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अनजान राहों की तलाश में पथिक

Posted: Thu Nov 04, 2010 1:16 pm
by csahab
मेरी नयी कविता : अनजान राहों की तलाश में पथिक

एक सुबह जब उठा नींद से
मन था व्याकुल सोच-सोच कर

रात आया स्वप्न ऐसा
उठ कर बैठा में भौचक्का

फिर कदम बढ़ाया,
जा निकला अनजान राहों पर

गोधुली बेला पर शांत था सब कुछ
धड़कन की आवाज़ भी कभी सुनता

कभी जानवर की आहट
कभी खुद का साया भी दिखता

न पता कहाँ जा रहा था,
अनजान राहों पर चला जा रहा था

खुद से पूछता रास्ता नया
खुद से बताता मंजिले नई

जब आती कोई मंजिल
खुद कहता नहीं ये नहीं मेरी मंजिल

सूरज अब लाल हुआ,
चलना दुश्वार हुआ

लालिमा से साथ भरम भी टूटा
संसार से आत्मसात हुआ

मुड गए पग वापस
जब अंतर्मन में अपनों का चरितार्थ किया

अनजान राहों पर चलना है कठिन,
आज इसका अहसास हुआ

Re: अनजान राहों की तलाश में पथिक

Posted: Sun Nov 07, 2010 8:19 am
by Ek Kanya
beautiful... very nice...

Re: अनजान राहों की तलाश में पथिक

Posted: Sun Nov 07, 2010 12:25 pm
by csahab
thanks

Re: अनजान राहों की तलाश में पथिक

Posted: Tue Nov 23, 2010 5:58 pm
by Anjana Kamat
sweeeeet

Re: अनजान राहों की तलाश में पथिक

Posted: Tue Nov 23, 2010 6:17 pm
by csahab
theeeeek

Re: अनजान राहों की तलाश में पथिक

Posted: Thu Nov 25, 2010 12:07 am
by TruthHurts
eeeeeeek! ;-)