रिक्शे पे सवारी और उसकी रफ़्तार
आज कल ऑफिस में अत्यधिक काम कि वजह से आने और जाने का सारा समय बदल गया है । जिसके कारण लिखने का समय भी नहीं निकल पात हूँ चूँकि घर पर कंप्यूटर है पर इन्टरनेट न होने के कारण घर पर लिखने का काम नहीं कर पाता हूँ । इसलिए अपने ब्लॉगर के कारण ऑफिस के कंप्यूटर पर ही निर्भर हूँ । उसका एक कारण और है । वो मेरा समय मेरे घर से ज्यादा ऑफिस में ही बीतता है । दिन का कुल १०घंटे से ज्यादा समय ऑफिस में देना पड़ता है जो कि खुद एक बहुत बड़ा काम है । आज लेबर दिवस के रूप में पूरे भारत में मनाया जाता है । बड़े बड़े संस्थान बंद है आज हमरा ऑफिस आज भी खुला है । चलो इसी बहाने मेरा ब्लॉग भी छप जायेगा वरना आज भी नहीं लिख पाता । अगर आपने गौर किया हो तो रिक्शे वालों कि क बात मुझे बड़ी अच्छी लगाती है । जब कोई पुरुष रिक्शे पर बैठता है तो रिक्शे वाले के चलने का तरीका बदल जाता है और जब कोई महिला किसी रिक्शे पर बैठती है तो रिक्शे वाले का चलने का तरीका बदल जाता है । जैसी जब कोई लड़का बैठा रिक्शे पर और वो बोल दे कि भैया जरा तेज चलाना तो रिक्शे वाला तुनक कर कहेगा कि भाईसाहब जितना दम होगा उतना ही चलूँगा न अब कोई अपनी जान तो नहीं दे दूँगा । बात भी सही उसकी । चाहे लड़का कितना भी हल्का हो रिक्शा अपने औसत रफ़्तार से थोडा कम ही चलेगा । और दूसरी तरफ कोई महिला रिक्शे पर बैठ जाये तो महिला सवारी के संवाद बदल जाते है उन्हें कहना पड़ता है कि भाईसाहब जरा धीरे चलाओ मुझे इतनी जल्दी नहीं है । ओए ऐसा नहीं है रिक्शेवाले के शरीर पर उसकी रफ़्तार निर्भर करती है हालाँकि किसी किसी कि करती है पर वो अपवाद है । मैंने कई बुजुर्ग रिक्शे वालों को महिला सवारी बैठा पर भगाते हुए भी देखा मुझे समझ में नहीं आया कि ये रफ़्तार कब से सवारी के लिंग पर निर्भर होने लगी है । काश ये ख्याल मोटरसाइकिल बनाने वाले आविष्कारक को आया होता हो आज मोटर कि जरुरत नहीं पड़ती । रिक्शा ही मोटर का रूप ले लेता । आप अगर पुरुष है और रिक्शे पर बैठे हैं तो समझ लीजिए ही आप समय से पहले घर से निकल जाइये वर्ना समय पर रिक्शा तो नहीं पहुचायेगा । मेरा मनना तो ये है कि जहाँ मोटर को बनाने में इतने लाखो करोडो रुपये खर्च हो रहे है वंही उनको इस बात को भी गौर करना चाहिए कि ऐसा कौन का गुरुत्व का बल लगता है सवारी रिक्शे वाले में एक्स्ट्रा होर्से पॉवर दे देती है जो उसकी रफ़्तार अपने आप चरम पर पहुच जाती है । मेरी रिक्शे वालों से कोई जातीय दुश्मनी नहीं है पर ये एक ऐसा शोध का विषय था जिसे में बचपन से शोध करना चाहता था कि इसके पीछे कारन क्या है । मैंने इसके लिए कुछ लोगो से बात भी करना चाहा पर उब्को ये टापिक उतना अच्छा नहीं लगा और वो एस सिरे से मुकर गए । मैंने भी वक्त के साथ इसको भूल गया । बस देख देख कर कुछ गौर करने कि कोशिश अब तक करता हूँ । ये गुण मेरे ख्याल से प्रतेक शहर के रिक्शे वाले में पाया जाता है । चाहे वो कानपूर हो या लखनऊ या फिर बिहार या जयपुर । मेरे ख्याल से ये रिक्शे वालों का कोई विशेष गुण है । जो सिर्फ रिक्शेवालों में पाया जाता है । तो अगली बार जब भी आप रिक्शे पर बैठे तो ऐसा आजमा कर जरूर देखे । और हो सके तो मुझे जरूर बताये ।
मेरी टाइम पास कविताये और कहानियां
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Re: मेरी टाइम पास कविताये और कहानियां
wow. love the fact that you have written the whole thingf in Hindi. I am sorry, I dont know how to type in hindi, but you are right about the observation with auto ricksaw drivers. I have myself seen the difference. some of them re flirtatious and some are protective. its kind of strange...
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- DesignBoyz
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Re: मेरी टाइम पास कविताये और कहानियां
hi can we see more of your kahaniyaan? its been a such a long time and people seem to have forgotten stories...
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