कभी कभी कुछ लिखने का मन होता है पर जब कलम उठता हूँ तो कुछ लिख नहीं पाता कारण नहीं पाता चल पाया है। खैर कुछ दिन पहले बस में किसी को देख कर कुछ पंक्तियों को लिखा था जिनको आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ आशा है आपको पसंद आयेगी। मेरी ये नज़्म
तेरे अक्स कि तलाश में
तेरी खुशबू का अहसास
कर देता है मदहोश
तुझे महसूस करता हूँ फ़िज़ाओं में
हवाओं में, साँस लेते अहसासों में
जब तुझे उकेरता हूँ
कागज पर
क्यों नज़र नहीं आता
तेरा वो हसीन चेहरा
वो चमकती आंखे
वो जुल्फों का साया
वो गालों पर गहरा समंदर
वो मासूम मुस्कान
वो सुबह की पहली अंगड़ाई
जैसे पंक्षी उड़े आकाश में
सपनों को सोच कर मुस्कुराना
फिर उलझी जुल्फों को सुलझाना
नहीं खींच पाता
मैं तेरा अक्स कागजों पर
रंगीन कलमों से
देखा था तुझे रात में
बरसात के बाद में
तस्वीर कुछ धुंधली थी
अँधेरी रात में लिपटी थी
हवा के साथ उड़ता था आंचल
चेहरा था धुंध में श्यामल
सोचा कि तुझे बाँहों में भर कर देख लू
तुझे छू कर महसूस कर लू
पर तू हो गई आँखों से ओझल
आज भी उसी स्वप्न कि आस में सोता हूँ
हर वक्त तेरी सोच में होता हूँ
©Csahab
http://www.twitter.com/csahab
तेरे अक्स कि तलाश में
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तेरे अक्स कि तलाश में
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Re: तेरे अक्स कि तलाश में
nice. I like what you keep writing 
Kikikikikiki bleach-treated my avatar! Isn't she sweet?