मेरी नयी कविता : अनजान राहों की तलाश में पथिक
एक सुबह जब उठा नींद से
मन था व्याकुल सोच-सोच कर
रात आया स्वप्न ऐसा
उठ कर बैठा में भौचक्का
फिर कदम बढ़ाया,
जा निकला अनजान राहों पर
गोधुली बेला पर शांत था सब कुछ
धड़कन की आवाज़ भी कभी सुनता
कभी जानवर की आहट
कभी खुद का साया भी दिखता
न पता कहाँ जा रहा था,
अनजान राहों पर चला जा रहा था
खुद से पूछता रास्ता नया
खुद से बताता मंजिले नई
जब आती कोई मंजिल
खुद कहता नहीं ये नहीं मेरी मंजिल
सूरज अब लाल हुआ,
चलना दुश्वार हुआ
लालिमा से साथ भरम भी टूटा
संसार से आत्मसात हुआ
मुड गए पग वापस
जब अंतर्मन में अपनों का चरितार्थ किया
अनजान राहों पर चलना है कठिन,
आज इसका अहसास हुआ
अनजान राहों की तलाश में पथिक
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Re: अनजान राहों की तलाश में पथिक
beautiful... very nice...
- Anjana Kamat
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Re: अनजान राहों की तलाश में पथिक
sweeeeet
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