मुझे बस में यात्रा करते हुए कोई 2 दशक से थोडा कम ही हुआ होगा बस इतने सालों को ब्लॉग के जरिये समेट पाना थोडा मुश्किल काम है पर में इसे लगातार लिखने का प्रयास करता हूँ ताकि धीरे धीरे ये इतने साल महीनो में बदल जाये और मेरी आदत लग जाये । ब्लॉग लिखेने की शुरुवात एक मजाक मजाक में हुई थी पर अब ये थोड़ी थोड़ी आदत में बदल गयी है । अब ब्लॉग लिखें में मज़ा आता है और शब्दों का विस्तार भी होता है । जिससे मुझे लगातार लेखन में मदद मिलती है । कुछ हाफ़ पतलून वाले मित्र पढ़ भी लेते है और थोड़े अनजान कमेन्ट भी कर देते है । जब कोई ब्लॉग पर कुछ लिखता है तो बड़ा मज़ा आता है और जब कोई मेरे ब्लॉग पर कुछ टिप्पणी करता है मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित करता है जिससे मैं थोडा और अच्छा लिखू ।
बस के इतने सफर में मैंने बहुत कुछ देखा और बहुत कुछ लिखा । आज जो लिखूंगा वो थोडा हास्यप्रद और थोडा गुदगुदाने वाला होगा । कभी आपने “चोर पे मोर” वाली कहावत सुनी है अगर नहीं सुनी तो आज सुन भी लीजिए और पढ़ भी लीजिए । बात शनिवार की है जगह मेरे घर के पाससस तो नहीं हाँ उस स्टैंड की जरूर है जहाँ से में रोज बस पकड़ता हूँ । मेरे पास 2004 मॉडल का नोकिया 1112 फोन था जिसपे मेरे सारे घरवालों की निगाह थी क्योंकि मेरा फोन मेरी तरह बेशर्म था पिछले 4 सालों से ना खराब हुआ था ना किसी ने उसे चोरी करने का साहस किया तो उसे भी खुद पे बड़ा घमंड था और साथ में मुझे भी था क्योंकि शायद ही किसी के पास कोई मोबाइल इतने समय तक चला हो । उसे रखने का एक कारण और था उससे जुड़ी यादें । जिन्हें मैं बड़ी ही नजाकत से सम्भाल कर रखे हुए था उस फोन ने हर सुख में और हर दुःख में मेरा साथ दिया था । न जाने कितनी बार किसी के हाथ में जाने के बाद भीनी सी खुशबू ले कर वापस आया था वो फोन(बैज्ञानिक उसे बैक्टीरिया बोलते हैं ) । सच कहू तो मुझे ये याद नहीं की वो फोन मेरे पास कैसे और किस कारण से आया था । पर वो फोन मेरे बहुत करीब था । बहराल रोज की तरह मैं बस का इंतज़ार कर रहा था । उस दिन में ऑफिस जाने में लेट बहुत लेट था क्योंकि शनिवार था और शुक्र की रात में 1 बजे तक काम हुआ थ ऑफिस में तो देर से जाने का हकदार था । आज मुझे नयी बस से जाना था क्योंकि उस रोज मेरी रोज वाली बस का समय नहीं था । पता नहीं क्यों बस में आज भीड़ थी पर जब अंदर चढा तप पता चल की बस के गेट को 2-3 लोगों अजीब तरह से घेर रखा है ना कोई आगे जा पा रहा है ना पीछे । तभी मुझे शक हुआ और मैंने अपना मोबाइल चेक किया । जेब में अपने मोबाइल को महसूस कर के बहुत अच्छा लगा पर मेरा विश्वास भी भी दूर नहीं हुआ था पर पीछे से आई भीढ़ ने मुझे जबरन आगे आने पे मजबूर कर दिया और मैं आगे बढ़ गया । पर मेरा ध्यान मोबाइल से हट गया । यंही वो गलती थी जो मुझे नहीं करनी थी पर क्या करता । जो होना था वो हो गया । जेबकतरों के ग्रुप ने मेरा मोबाइल निकाल लिया था । और अब तक मुझे पता नहीं था चूँकि बस में भीड़ थी तो मेरा ध्यान भी गया । पर चोरों ने काम लगा दिया था । जब बस 2 स्टॉप पार कर गयी तो मुझे मोबाइल के चोरी होने का अहसास हुआ । फिर जो होना था वो हो चुका था मेरी यादों का उड़नखटोला उड़ चुका था । अब मुझे कभी कभी बड़ा दुःख हो तो कभी संतोष क्योंकि में मुझे थोड़ी खुशी भी थी थोडा गम भी । खुशी इस बात की थी की मैं अब नया फोन खरीदूंगा और गम इस बात का की आखिरकार मेरी यादें मुझसे जुदा हो गयी जिन्हें मैंने बड़ी जतन से संभल कर रखा था । बस से उतर कर मैंने सबसे पहले पुलिस को सूचित किया । और नए मोबाइल की खोज में लग गया । अभी भी मेरा विश्वास है की चोर उस बस को दुबारा शिकार जरूर बनायेंगे । अब कोई कैमरा वाला फोन लूँगा ताकि उन चोरों की पिक्चर ले कर पोस्ट कर सकू ताकि बाकी लोग भी सावधान हो सके । नोकिया का x2 फोन अच्छा है उसके आने के इंतज़ार में हूँ ।
बस में मैं भी हुआ शिकार, जुदा हुआ यादों का संसार
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Re: बस में मैं भी हुआ शिकार, जुदा हुआ यादों का संसार
love reading your thoughts...
Truth Hurts. But bad advertising hurts even more.
Re: बस में मैं भी हुआ शिकार, जुदा हुआ यादों का संसार
yeah, you should try and compile them into a book or something...
Re: बस में मैं भी हुआ शिकार, जुदा हुआ यादों का संसार
thanks i will think on this
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